चाणक्य नीति का असर – छत्तीसगढ़ से हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और अब बंगाल में खिला कमल

दिल्ली, 8 मई — बंगाल की वह धरती, जो कभी Rabindranath Tagore के संगीत, Swami Vivekananda की आध्यात्मिक आभा और Sarat Chandra Chattopadhyay की अमर रचनाओं से महकती थी, पिछले कई दशकों से ऐसी खामोशी में डूबी हुई थी जो विकास नहीं बल्कि विनाश का संकेत देती थी। यही बंगाल कभी पूरे देश को दिशा देने वाला प्रदेश माना जाता था, लेकिन समय के साथ यह राजनीतिक हिंसा और प्रतिशोध की राजनीति के अंधेरे रास्तों में उलझता चला गया।

पहले 35 वर्षों तक चले वामपंथी शासन ने बंगाल की औद्योगिक संरचना को कमजोर किया और उसके बाद पिछले 15 वर्षों में All India Trinamool Congress के शासनकाल में राज्य पर भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण और अव्यवस्था के आरोप लगते रहे। जूट मिलों के बंद होने से फैक्ट्रियों के सायरन शांत हो गए, उद्योग ठप पड़ गए और रोजगार की तलाश में युवाओं को अपनी धरती छोड़नी पड़ी। सांस्कृतिक पहचान वाले इस राज्य में रवींद्र संगीत की जगह बम और गोलियों की आवाजें सुनाई देने लगीं। संदेशखाली से लेकर R. G. Kar Medical College and Hospital तक की घटनाओं ने महिलाओं की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए।

लेकिन वर्ष 2026 की गर्मियों ने एक नई राजनीतिक कहानी की शुरुआत का संकेत दिया। जब भारतीय राजनीति के आधुनिक “चाणक्य” कहे जाने वाले Amit Shah कोलकाता के दमदम एयरपोर्ट पर पहुंचे, तो उनके चेहरे पर स्पष्ट संकल्प और आंखों में रणनीतिक दृष्टि दिखाई दे रही थी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, अमित शाह यह समझ चुके थे कि बंगाल अब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि अपनी खोई हुई पहचान की वापसी चाहता है। छत्तीसगढ़, हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली के बाद अब बंगाल में भी अमित शाह की रणनीति को भाजपा के विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है। दिल्ली के वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलकर अमित शाह ने लगातार लगभग 15 दिनों तक बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में दौरे किए। उनकी शैली ने यह संदेश देने की कोशिश की कि यह केवल चुनावी अभियान नहीं, बल्कि संगठनात्मक और वैचारिक विस्तार का प्रयास है।

अमित शाह की राजनीतिक कार्यशैली की सबसे बड़ी विशेषता उनका दृढ़ संकल्प माना जाता है। राजनीतिक गलियारों में अक्सर कहा जाता है कि चाहे भवानीपुर हो या नई दिल्ली, संकल्प को परिणाम में बदलना ही अमित शाह की पहचान बन चुकी है। Bharatiya Janata Party का बंगाल में उभार किसी एक दिन का चमत्कार नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे संगठनात्मक प्रयासों का परिणाम बताया जा रहा है। 2016 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को केवल तीन सीटें मिली थीं। इसके बावजूद पार्टी ने जमीनी स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करनी जारी रखी। 2021 तक भाजपा की सीटें बढ़कर 77 हो गईं, जिसने मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती पेश की। लेख में दावा किया गया है कि 2026 तक भाजपा का 207 सीटों तक पहुंचना अमित शाह की संगठन क्षमता और बूथ प्रबंधन रणनीति की सफलता का प्रतीक है।

50 से अधिक रैलियों और कई रोड शो के जरिए अमित शाह ने न केवल राजनीतिक भाषण दिए, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी बार-बार उल्लेख किया। भाजपा नेताओं का आरोप है कि राज्य की पहचान तथाकथित “कट मनी” और सिंडिकेट संस्कृति के कारण प्रभावित हुई। उत्तर बंगाल के चाय बागानों से लेकर सुंदरबन के इलाकों तक भाजपा के चुनाव चिन्ह “कमल” की चर्चा तेज होने लगी। समर्थकों के अनुसार, अमित शाह द्वारा खड़ा किया गया संगठनात्मक ढांचा इतना मजबूत हो गया कि तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक कैडर नेटवर्क कमजोर पड़ने लगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *