अमृतसर, 5 अगस्त (के.एल. जीत वालिया):अमृतसर के प्रसिद्ध खेल प्रोत्साहक गुरिंदर सिंह मट्टू ने आज गुरदासपुर जिले के गांव मरड़ के निवासी और भारतीय हॉकी के स्वर्णिम दौर के महान खिलाड़ी ओलंपियन ब्रिगेडियर हरचरण सिंह से विशेष मुलाकात की। हरचरण सिंह ने उस समय भारत का प्रतिनिधित्व किया जब भारतीय हॉकी का विश्वभर में दबदबा था।
15 जनवरी 1950 को जन्मे हरचरण सिंह के पिता सरदार दर्शन सिंह अपने क्षेत्र के प्रसिद्ध कबड्डी खिलाड़ी थे। उन्होंने खालसा हाई स्कूल, शेखूपुरा से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद स्पोर्ट्स कॉलेज, जालंधर में प्रवेश लिया। उनकी प्रतिभा के चलते उन्हें 1968 में भारतीय हॉकी टीम के प्रशिक्षण शिविर में बुलाया गया।
1969 से 1978 तक उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए तीन विश्व कप, दो ओलंपिक और दो एशियाई खेलों में भाग लिया तथा भारत के लिए स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीते। उन्हें 1977-78 में तत्कालीन राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी द्वारा अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारतीय सेना में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 1981 में विशिष्ट सेवा पदक भी प्रदान किया गया।
साक्षात्कार के प्रमुख अंश
प्रश्न: आपने हॉकी खेलना कब शुरू किया और आपके कोच कौन थे?
उत्तर:
“मैंने सातवीं कक्षा में हॉकी खेलना शुरू किया। मेरे पहले कोच सरदार दलीप सिंह थे। स्पोर्ट्स कॉलेज में मनमोहन सिंह मेरे कोच रहे। बाद में पंजाब, भारतीय सेना और भारत की ओर से खेलते समय मुझे गुरचरण सिंह बोधी, ऊधम सिंह, बलबीर सिंह, आर.एस. जेंटल और के.डी. सिंह बाबू जैसे महान कोचों का मार्गदर्शन मिला।”
प्रश्न: भारतीय टीम में आपका चयन कैसे हुआ?
उत्तर:
“1968 में कॉलेज की ओर से पूर्वी जर्मनी के खिलाफ खेलने का अवसर मिला। 1969 में पंजाब की ओर से राष्ट्रीय प्रतियोगिता में खेलने के बाद मेरा चयन भारतीय टीम में हो गया।”
प्रश्न: ओलंपिक में खेलने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर:
“विश्व कप और एशियाई खेलों का अनुभव अलग होता है, लेकिन 1972 म्यूनिख और 1976 मॉन्ट्रियल ओलंपिक में खेलना मेरे जीवन का सबसे विशेष अनुभव रहा।”
प्रश्न: आपने किन-किन देशों में खेला?
उत्तर:
“मैंने लगभग 20 बार भारत का प्रतिनिधित्व किया और लगभग हर उस देश में गया जहां हॉकी खेली जाती है। पेरिस, बर्लिन और सिंगापुर जैसे देशों में कई बार खेलने का अवसर मिला।”
प्रश्न: अपने खेल जीवन की कोई यादगार घटना बताइए।
उत्तर:
“एम्स्टर्डम में एक प्रतियोगिता से पहले मेरे पैर में गंभीर मोच आ गई थी। मुझे पहले अनफिट घोषित कर दिया गया था, लेकिन मैंने टीम में अपनी जगह के लिए संघर्ष किया और चोट के बावजूद शानदार प्रदर्शन किया।”
प्रश्न: पंजाब और सेना की ओर से खेलने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर:
“1969 से 1972 तक पंजाब की ओर से खेला और हर वर्ष राष्ट्रीय खिताब जीता। 1973 से 1981 तक भारतीय सेना की ओर से खेला और कई बार टीम की कप्तानी भी की। सेना की ओर से खेलना मेरे लिए बेहद गर्व की बात थी।”
प्रश्न: खिलाड़ी बनना आसान है या कोच/मैनेजर?
उत्तर:
“मेरे विचार से खिलाड़ी बनना आसान है, जबकि कोच और मैनेजर की जिम्मेदारी कहीं अधिक कठिन होती है।”
प्रश्न: राष्ट्रीय खेल दिवस के बारे में बताइए।
उत्तर:
“राष्ट्रीय खेल दिवस हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की जयंती पर मनाया जाता है। इसी अवसर पर भारत सरकार खिलाड़ियों को विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित करती है। इस वर्ष सरहद-ए-पंजाब स्पोर्ट्स क्लब (रजि.), अमृतसर के 25वें सिल्वर जुबली पुरस्कार समारोह में मुझे लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से सम्मानित किया जाएगा।”
प्रश्न: युवा खिलाड़ियों के लिए आपका संदेश?
उत्तर:
“युवा खिलाड़ियों को मेहनत, अनुशासन और समर्पण के साथ खेलना चाहिए। अपने कोच और वरिष्ठ खिलाड़ियों का सम्मान करें। हमेशा टीम और देश के लिए खेलें। मोबाइल की लत, नशे और अन्य बुरी आदतों से दूर रहें।”