उस्ताद मास्टर समीर राणा की स्मृति में संगीतमय कार्यक्रम में 20 प्रमुख शख्सियतों को किया गया सम्मानित

 

अमृतसर, 22 अप्रैल (के.एल. जीत वालिया)- संगीत को समर्पित एक भावुक और आध्यात्मिक रंगों से भरपूर कार्यक्रम उस्ताद मास्टर समीर राणा जी के 54वें जन्मदिवस के अवसर पर उनकी पावन स्मृति में प्रभाकर सीनियर सेकेंडरी स्कूल, छेहरटा में भव्य रूप से आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अगुवाई प्रिंसिपल राजेश प्रभाकर एवं प्रिंसिपल रचना प्रभाकर ने की, जबकि आयोजन का संचालन उनके करीबी शिष्य एवं प्रसिद्ध संगीतकार कवलजीत बब्बलू की देखरेख तथा पुत्र लक्ष्य राणा के मार्गदर्शन में किया गया।

इस अवसर पर उस्ताद समीर राणा जी को एक महान शास्त्रीय गायक, अनुभवी शिक्षक और प्रेरणादायक मार्गदर्शक के रूप में याद किया गया, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार-प्रसार और नई पीढ़ी को शिक्षित करने के लिए समर्पित कर दिया।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध कलाकार पंडित दीपान राज (शास्त्रीय गायक) और सिद्धार्थ चटर्जी (तबला वादक) ने अपनी मधुर प्रस्तुतियों से समां बांध दिया और पूरे वातावरण को आध्यात्मिकता से सराबोर कर दिया।

इस स्मृति समारोह में 80 से अधिक विद्यार्थियों और बच्चों ने भाग लिया, जिससे यह एक भव्य और भावनात्मक आयोजन बन गया। कार्यक्रम ने उस्ताद जी द्वारा दिए गए अनुशासन, संस्कार और संगीत मूल्यों को जीवंत रूप में प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर उस्ताद समीर राणा की धर्मपत्नी श्रीमती सरस्वती राणा द्वारा लगभग 20 प्रमुख शख्सियतों एवं सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित व्यक्तियों में काउंसलर सतीश कुमार बल्लू, पंजाब मीडिया टाइम्स के मुख्य संपादक के.एल. जीत वालिया, नेहा बाली, बिर्कमल प्रीत सिंह, प्रसिद्ध संगीतकार राहुल (आर.बी.), सोनू जी, डॉ. अश्विनी कुमार, डॉ. किरण, राजेश राजू, एंकर मदन लाल मदी, निधि, प्रिंसिपल राजेश प्रभाकर, जीएनडीयू संगीत विभाग प्रमुख राजेश शर्मा, प्रिंसिपल कवलजीत सिंह, उस्ताद जसवंत सिंह, जगमोहन कोछड़ सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने घोषणा की कि यह संगीतमय श्रद्धांजलि समारोह अब प्रतिवर्ष आयोजित किया जाएगा और भविष्य में इसे और भी बड़े स्तर पर मनाया जाएगा, ताकि उस्ताद समीर राणा जी की विरासत सदैव जीवित रह सके।

“महान हस्तियां कभी मरती नहीं, वे अपनी कला और अपने शिष्यों के माध्यम से हमेशा जीवित रहती हैं।”

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