अमृतसर (के.एल. जीत वालिया) – उस्ताद श्री समीर राणा जी भारतीय शास्त्रीय संगीत जगत की एक अत्यंत सम्मानित हस्ती थे। वे केवल एक कलाकार ही नहीं, बल्कि एक महान शिक्षक, मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत भी थे, जिनकी पूरी जिंदगी संघर्ष, विनम्रता और अपनी कला के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक रही।
ओडिशा के एक साधारण परिवार में जन्मे उस्ताद जी के लिए संगीत की राह आसान नहीं थी। उस समय उनके क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के अवसर सीमित थे, लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से हर कठिनाई को पार किया। अपने गुरुओं के मार्गदर्शन में उन्होंने वर्षों तक कठोर रियाज़ किया और संगीत की बारीकियों को गहराई से आत्मसात किया। यही संघर्ष उनके व्यक्तित्व की मजबूती और परंपरा के प्रति सम्मान का आधार बना।
उन्होंने ओडिशा में ही अपने अध्यापन की शुरुआत की, जहां उन्होंने अनेक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी और उनमें कला के प्रति प्रेम जगाया। 1990 के दशक में, जब पंजाब अशांति के दौर से गुजर रहा था, तब उन्होंने हिम्मत के साथ यहां आकर अपनी नई यात्रा शुरू की। नई भाषा और संस्कृति के बीच उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि वे न तो पंजाबी और न ही हिंदी अच्छी तरह जानते थे। इसके बावजूद, अपने सरल स्वभाव और समर्पण से उन्होंने लोगों का विश्वास और सम्मान प्राप्त किया।
उस्ताद जी ने विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में सेवाएं दीं और सेना से जुड़े संस्थानों में भी संगीत सिखाया। उनके योगदान को कई बार सम्मानित किया गया और उन्हें विधायकों व सांसदों द्वारा भी सम्मान मिला।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता उनकी उदारता थी। वे मानते थे कि संगीत एक ऐसा वरदान है जिसे सभी के साथ बांटना चाहिए। उन्होंने कभी भी अपने विद्यार्थियों से फीस की अनिवार्यता नहीं रखी—जो सक्षम थे, वे अपनी इच्छा से सहयोग करते थे और जो नहीं दे सकते थे, उन्हें भी समान शिक्षा दी जाती थी। उनके लिए जुनून और समर्पण सबसे महत्वपूर्ण थे।
आज उनके विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में सफलता हासिल कर रहे हैं। प्रसिद्ध म्यूजिक डायरेक्टर कंवलजीत बब्बलू, पंजाबी संगीत जगत के कई अन्य कलाकार, खालसा कॉलेज अमृतसर की प्रोफेसर नेहा बाली, श्री दरबार साहिब से जुड़े प्रसिद्ध तबला वादक बिक्रमजीत सिंह—सभी के कार्यों में उनकी शिक्षा की झलक दिखाई देती है। उनके पुत्र लक्ष्य भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संगीत को आगे बढ़ा रहे हैं, विशेष रूप से अमेरिका में कार्यक्रम आयोजित कर कलाकारों को मंच प्रदान कर रहे हैं।
भले ही आज उस्ताद श्री समीर राणा जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी शिक्षाएं और उनका प्रभाव सदैव जीवित रहेगा। उनकी जिंदगी हमें सिखाती है कि सच्ची लगन, निस्वार्थ सेवा और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पण से हर मुश्किल को पार किया जा सकता है।
आज उनकी स्मृति में प्रभाकर सीनियर सेकेंडरी स्कूल, छेहरटा में एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है, जहां संगीत के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की जाएगी।